हाल के वर्षों में भारत में कई ऐसी कंपनियां रही हैं, जिनके शेयरधारकों का निवेश लगभग पूरी तरह डूब गया। इनमें कुछ मामलों में शेयर डीलिस्ट हो गये, कुछ में शेयरों का मूल्य लगभग शून्य हो गया और कुछ कंपनियां दिवाला प्रक्रिया में चली गयीं। कहने का मतलब है कि शेयर बाजार में पैसा बनता तो है, पर डूबता भी है। आयें देखें कैसे निवेशकों का पैसा शून्य भी हो सकता है।
1. Jaiprakash Associates Limited
- कभी भारत की सबसे बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों में शामिल थी।
- 2024 में कंपनी दिवाला प्रक्रिया में गयी।
- 2026 में इसकी डीलिस्टिंग का फैसला हुआ और मौजूदा शेयरधारकों को शून्य (Nil Consideration) देने का प्रावधान रखा गया।
- लगभग छह लाख छोटे निवेशकों का लगभग पैसा फंस गया।
एक समय था जब जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (JAL) को भारत के सबसे महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर समूहों में गिना जाता था। आज वही कंपनी बदनुमा दाग के साथ इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गयी। 18 जून 2026 से कंपनी के शेयर बीएसइ और एनएसइ से डीलिस्ट हो गये। इसके लगभग छह लाख शेयरधारकों को अपने निवेश के बदले एक भी पैसा नहीं मिला।
कैसे आगे बढ़ी कंपनी
Jaiprakash Associates Limited की शुरुआत इंजीनियर और उद्यमी Jaiprakash Gaur ने की थी। कंपनी ने बांध, सड़क, बिजली, सीमेंट और रियल एस्टेट में तेजी से विस्तार किया। 2000 के दशक में जयपी समूह भारत के विकास की कहानी का प्रतीक बन गया था। कंपनी ने:
- उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे बनाये।
- देश की बड़ी सीमेंट कंपनियों में जगह बनायी।
- नोएडा और ग्रेटर नोएडा में टाउनशिप विकसित की।
- भारत का पहला Indian Grand Prix आयोजित कराने के लिए फॉर्मूला-1 सर्किट बनाया।
एक समय कंपनी का बाजार पूंजीकरण हजारों करोड़ रुपये था और उसके शेयर निवेशकों की पसंद बने हुए थे।
फिर कहां हुई चूक?
समस्या कंपनी के अत्यधिक विस्तार से शुरू हुई। कंपनी ने भारी कर्ज लेकर एक साथ कई परियोजनाएं शुरू कर दीं।
इसके बाद कई झटके लगे—
- रियल एस्टेट बाजार में मंदी आयी।
- परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो सकीं।
- ब्याज का बोझ लगातार बढ़ता गया।
- नकदी प्रवाह कमजोर पड़ गया।
धीरे-धीरे कंपनी का कर्ज 55,000 करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया।
दिवाला प्रक्रिया में प्रवेश
जून 2024 में कंपनी को दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत कॉर्पोरेट दिवाला प्रक्रिया में भेज दिया गया। इसके बाद कई कंपनियों ने बोली लगायी, जिनमें वेदांता और अडानी समूह प्रमुख थे। अंततः लेनदारों ने अडानी समूह की योजना को मंजूरी दी क्योंकि उसमें अधिक अग्रिम भुगतान और कम समय में समाधान का प्रस्ताव था।
ताजा फैसला: शेयरधारकों के लिए शून्य
मार्च 2026 में National Company Law Tribunal ने अडानी समूह की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। योजना के अनुसार—
- कंपनी की मौजूदा इक्विटी पूंजी समाप्त कर दी गयी।
- सभी पुराने शेयर रद्द माने जायेंगे।
- शेयरधारकों को “Nil Consideration” यानी शून्य भुगतान मिलेगा।
- कंपनी के शेयर 18 जून 2026 से बीएसइ और एनएसइ से डीलिस्ट हो गये।
शेयरधारकों को कुछ क्यों नहीं मिलेगा?
IBC के तहत भुगतान की प्राथमिकता तय होती है:
- दिवाला प्रक्रिया की लागत
- सुरक्षित वित्तीय लेनदार (बैंक)
- अन्य लेनदार
- परिचालन लेनदार
- अधिमान्य शेयरधारक
- इक्विटी शेयरधारक
जब कंपनी की परिसंपत्तियों का मूल्य इतना नहीं बचा कि बैंकों का पूरा पैसा भी लौटाया जा सके, तब इक्विटी शेयरधारकों के हिस्से में कुछ भी नहीं आया। न्यायाधिकरण द्वारा स्वीकृत योजना में स्पष्ट कहा गया है कि शेयरधारकों को कोई प्रतिफल नहीं मिलेगा।
निवेशकों के लिए बड़ा सबक
जयप्रकाश एसोसिएट्स की कहानी भारतीय कॉरपोरेट इतिहास के सबसे बड़े उत्थान और पतनों में से एक है। यह कहानी बताती है कि—
- तेज विस्तार हमेशा सफलता की गारंटी नहीं होता;
- अत्यधिक कर्ज सबसे मजबूत साम्राज्य को भी गिरा सकता है;
- शेयरधारक कंपनी के मालिक जरूर होते हैं, लेकिन दिवाला प्रक्रिया में उनकी बारी सबसे आखिर में आती है।
2. Dewan Housing Finance Corporation Limited (DHFL)
- एक समय देश की बड़ी हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों में शामिल थी।
- वित्तीय अनियमितताओं और कर्ज संकट के बाद कंपनी दिवालिया हो गयी।
- समाधान प्रक्रिया के बाद पुराने शेयरधारकों की हिस्सेदारी लगभग बेकार हो गयी।
3. Reliance Capital Limited
- अनिल अंबानी समूह की वित्तीय सेवा कंपनी।
- भारी कर्ज और नकदी संकट के कारण दिवाला प्रक्रिया में गयी।
- पुनर्गठन के दौरान पुराने शेयरधारकों के लिए मूल्य बचने की संभावना बेहद सीमित रही।
4. Videocon Industries Limited
- कभी भारतीय उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार का बड़ा नाम थी।
- कर्ज संकट और दिवाला प्रक्रिया के बाद शेयर लगभग बेकार हो गये।
- लाखों खुदरा निवेशकों को भारी नुकसान हुआ।
5. Jaypee Infratech Limited
- यमुना एक्सप्रेसवे और नोएडा परियोजनाओं के लिए प्रसिद्ध कंपनी।
- दिवाला प्रक्रिया में गयी और परियोजनाओं के अधिग्रहण के बाद पुराने शेयरधारकों का मूल्य लगभग समाप्त हो गया।
6. IVRCL Limited
- देश की प्रमुख निर्माण कंपनियों में गिनी जाती थी।
- कर्ज और कथित वित्तीय अनियमितताओं के कारण कंपनी ढह गयी।
- शेयरधारकों का निवेश लगभग समाप्त हो गया।
निवेशकों के लिए सबक
इन सभी मामलों में एक बात समान रही—
- कंपनियों पर अत्यधिक कर्ज था।
- नकदी संकट और परियोजना देरी ने स्थिति बिगाड़ी।
- दिवाला कानून के तहत बैंकों और सुरक्षित लेनदारों को पहले भुगतान मिलता है।
- इक्विटी शेयरधारक सबसे आखिर में आते हैं, इसलिए अक्सर उनके हिस्से में कुछ नहीं बचता।
इसलिए केवल सस्ते शेयर देखकर निवेश नहीं करना चाहिए। किसी भी कंपनी में निवेश से पहले उसके कर्ज, नकदी प्रवाह, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और प्रमोटर की विश्वसनीयता की जांच करना बेहद जरूरी है।Top of Form दिवाला कानून का कठोर सच यही है—जब कर्ज परिसंपत्तियों से बड़ा हो जाता है, तो सबसे पहले उम्मीदें टूटती हैं और सबसे आखिर में शेयरधारकों का अधिकार शून्य में बदल जाता है।




